मन्ना दा पुण्य स्मरण..

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कुछ गाने जरा-मरण से मुक्त होते हैं। उनका यौवन बना रहता है। ऐसा ही एक गाना है बसंत बहार फिल्म का, सुर ना सजे क्या गाऊं मैं। ये गाना मैंने बहुत छोटी उम्र में घर के रेकॉर्ड प्लेयर पर सुना था लेकिन गायक-श्रोता के अन्योन्य़ाश्रय संबंधों के अर्थ में इस अमर गीत को सुनने का आनंद पहली बार तब आया, जब “दुख भी सुख का बन्धु बना” की शैली में जीवन को जीना-समझना शुरू किया। इस गीत का छोटा सा आलाप यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सिनेमा के पुरुष गायकों में मन्ना दा के अलावा किसी और में स्वरों का वैसा लाघव नहीं था, न ही तान का वैसा तूर्य था।
जिस विलक्षण स्वर में मन्ना दा ने इस गाने को उठाया है, वैसा उठान सिर्फ लता बाई के कंठ से ही संभव था। मन्ना दा इस गीत को गाते हुए एक संदेश देते हैं कि सिनेमा के गानों में भी उच्च कोटि की गायकी का मान रखा जा सकता है। यानी, गाने को एक विशिष्ट ऊंचाई पर ले जाया जा सकता है, एक ऐसी ऊंचाई, जिसे अनुभव कर संगीत के पारखी, पंडित, धुरंधर भी वाह कर उठे।
यह एक संयोग नहीं है कि शंकर जयकिशन ने इस गीत के लिए मन्ना डे को ही चुना। अवश्य ही उन्हें ये आश्वस्ति थी कि सिर्फ मन्ना दा ही गाने को उस विकल रागिनी के तट पर ले कर जा कर छोड़ सकते हैं, जहां सुर की नदी करुणा के तानपुरे पर अनंत काल से अपनी तरंगें टेर रही है। यकीन न हो तो सुन कर देख लीजिए, “संगीत मन को पंख लगाए, गीतों से रिमझिम रस बरसाए” और फिर ऊंची तान में स्वर की साधना! आह! सुर ना सजे, मेरे उत्पाती बचपन को संगीत से जोड़ने का सेतु है। इस गीत को कोई ऐसा गायक ही गा सकता था जो गाने को कला प्रदर्शन का जरिया नहीं मानता बल्कि साधना पथ के रूप में देखता है।
मन्ना दा ने अपने जीवन में कम गाने गाए । रफी और किशोर कुमार के मुकाबले तो बहुत ही कम लेकिन कई गानों में उनके सधे हुए स्वरों का जो आलोक है वह न तो रफी की रूमानियत में है और न किशोर के दर्द में, जबकि दर्द किशोर की आवाज में सहज रूप से डेरा डाले रहता है।
शंकर जयकिशन और एसडी बर्मन संभवत: यही वो दो संगीतकार थे, जिन्हें पता था कि मन्ना दा कितने परिष्कृत गायक हैं । सलिल चौधुरी ने भी उनसे कुछ अच्छे गाने गवाए हैं । सलिल चौधुरी के बनाए गानों में से दो बीघा जमीन फिल्म का एक यादगार गाना है…अपनी कहानी छोड़ जा…कुछ तो निशानी छोड़ जा । ये धुन भारतीय नहीं है । सलिल चौधरी ने इसे रूसी सेना के पारंपरिक बैंड से उठाया है लेकिन गाना सुनने में भारतीय लगता है। इस गाने को कभी ध्यान से सुनियेगा । मौसम बीता जाय कहते हुए मन्ना दा जैसे सब कुछ कह जाते हैं कि बटोर लो प्रेम के फूल, बुहार लो जीवन-राग का पथ । समेट लो इस प्रकृति को अपनी बाहों में । गाना विमल राय की क्लासिक फिल्म में प्रकृति पूजक किसान नायक बलराज साहनी के व्यक्तित्व का दर्पण बन जाता है । पूरी की पूरी शख्सियत ही खुल जाती है । सलिल चौधुरी ने उनसे काबुलीवाला, और आनन्द के लिए भी अच्छे गाने गवाए।
मेरी नजर में भारतीय सिनेमा के सर्वकालीन बीस अच्छे गानों में से एक है, मेरी सूरत तेरी आंखें फिल्म का अमर गीत, पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई। इस गीत में मन्ना दा अपनी साधना को पुंजीभूत करते हैं। उनके भीतर का गायक जो लगातार इस पेचीदा मनोग्रंथि से जूझता रहा कि बेहतर होने के बावजूद उन्हें रफी और किशोर से बहुत कम क्यों गाने मिले।
कितनी विचित्र बात है कि जिन रफी के रेंज को लेकर इतनी चर्चा होती रही है और जिनकी गायकी की दाद सभी देते रहे हैं(देनी चाहिये भी ) उन्हें शंकर जयकिशन बसंत बहार फिल्म के उस गाने के लिए चुनने का ख्याल भी अपने मन में न ला सके जो पंडित भीमसेन जोशी के साथ गाने के लिए रचा गया था। केतकी गुलाब जूही चंपक वन फूले, गाने का प्रस्ताव जब मन्ना दा को दिया गया तो वे फौरन मुकर गए। एक तो वे भीमसेन जोशी के साथ गाने को तैयार न थे, दूसरे, इस बात के लिए तो उनकी आत्मा बिलकुल गवाही नहीं दे रही थी कि नायक के लिए गाते हुए उन्हें भीमसेन जोशी को हराना है। उन्हें इस गाने के लिए पंडित जी ने ही मनाया था।
हालांकि फिल्म में पंडित जी के स्वर को हारते हुए दिखाना हास्यास्पद है लेकिन आप अऩुभव कर सकते हैं कि उस गाने के साथ मन्ना दा ही न्याय कर सकते थे । मन्ना दा के जीवन का दुख यही था कि एक हद तक ऊच्च कोटि के शास्त्रीय गायकों के साथ गाने की पात्रता उऩमें थी लेकिन दिलीप कुमार और देवानंद के लिए गाने का आकर्षण उनकी आवाज में नहीं था। उनके स्वर की परिपक्वता ही उनकी लोकप्रियता और सर्वग्राह्यता में बाधा बनी। उऩकी आवाज में वो युवापन, वो रूमानियत नहीं है जो रफी और किशोर कुमार में है। एक किस्म की बुढ़ाई है उनके स्वरों में, जो पार्श्वगायक के रूप में उनकी भूमिका को सीमित करती है। आवाज का यही गुणधर्म उन्हें पुराने दौर के नायकों का स्वर बनने से रोकता है। वे कभी दिलीप कुमार, देवानंद, राजेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र की आवाज न बन सके, इक्के-दुक्के अपवादों को छोड़कर। राजकपूर के लिए भी उन्होंने कुछ गाने ही गाए । उनमें से सबसे रोमांटिक गाना ये रात भीगी-भीगी है।
एक और यादगार गीत जो मन्ना डे को महान मन्ना डा बनाता है, सीमा फिल्म का है, तू प्यार का सागर है। हिन्दी सिनेमा के सबसे समर्थ पुरुष गायक की जब भी बात होगी तो मन्ना डे सबसे ऊपर होंगे। वे ताउम्र अपनी विनम्रता में यह स्वीकार करते रहे कि मुहम्मद रफी उनसे बड़े गायक थे लेकिन भीतर ही भीतर इस विनम्र विश्वास ने उन्हें दुख भी पहुंचाया कि गाना उन्हें बेहतर आता था।

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