गर्भपात भी गठिया-रोग का लक्षण हो सकता है!

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गोपा की शादी को आठ साल हो चुके हैं, लेकिन वह अब भी माँ न बन सकी है। पिछले कई सालों से उसके गर्भ ठहरता है लेकिन वह टिक नहीं पाता। तीन बार तो यह सिलसिला आठ और नौ महीनों तक चला, लेकिन फिर उसके बाद मृत शिशु का जन्म हुआ। उसने कई प्रसूति-रोग-विशेषज्ञों से परामर्श लिया, जहाँ उसकी समस्या को विस्तार से समझने की कोशिश की गयी। एक प्रसूति-रोग विशेषज्ञ ने उसे एक बार र्यूमैटोलॉजिस्ट से मिलने की भी सलाह दी है। उन्हें शक है कि प्रतिरक्षा-तन्त्र की कोई ऐसी समस्या है, जिसके कारण वह माँ नहीं बन पा रही।
गोपा यह समझना चाहती है कि प्रतिरक्षा-तन्त्र किस तरह से उसके गर्भ को ठहरने से रोक रहा है। इसके लिए डॉक्टर उससे कई तरह के सवाल पूछते हैं। वे जानना चाहते हैं कि कभी उसके पैरों में दर्द के साथ सूजन की कोई स्थिति आयी है, अथवा नहीं। वे उससे किसी हृदय-रोग की सम्भावना के बारे में भी पूछते हैं। वे यह भी जानने के इच्छुक हैं कि कभी उसकी त्वचा पर कोई लाल दाने या निशान उभरे हैं अथवा नहीं। सिरदर्द-लक़वा-आँखों के आगे अँधेरा छाने-घटे हुए प्लेटलेट जैसी बातों पर भी वे गोपा से बारी-बारी चर्चा करते हैं।
दरअसल र्यूमैटोलॉजिस्ट और गायनेकोलॉजिस्ट, दोनों मिलकर जिस रोग का सन्देह कर रहे हैं, वह एंटीफॉस्फोलिपिड सिण्ड्रोम के नाम से जाना जाता है। यह एक ख़ास किस्म की बीमारी है जिसमें शरीर के भीतर ऐसी कई हानिकारक एंटीबॉडी नामक प्रोटीन बनती हैं, जो ख़ून के जमने को प्रभावित करती हैं। इसी कारण कई बार इस रोग से प्रभावित लोगों में अलग-अलग अंगों में तरह-तरह के लक्षण देखने को मिलते हैं।
लम्बे समय तक गर्भ का स्वतः नष्ट हो जाना या मृत शिशु का जन्म लेना, इस रोग की तरफ़ डॉक्टरों का ध्यान खींचता है। लेकिन कई बार अन्य अंगों में भी ख़ून के जम जाने से वहाँ लक्षण पैदा हो सकते हैं। पैरों की शिराओं में ख़ून का जमाना डीप-वेन-थ्रॉम्बोसिस कहलाता है। मस्तिष्क में ख़ून जमने से लक़वे का असर पैदा हो सकता है। साथ ही जाँच के दौरान प्लेटलेट-संख्या कम आ सकती है।
डॉक्टर ने गोपा के लिए कुछ जाँचें भेजीं हैं। ये महँगी जाँचें हैं, लेकिन इनसे एंटीफॉस्फोलिपिड सिण्ड्रोम का पता लगाने में उनको मदद मिलेगी। अब सबको नज़रें गोपा की आने वाली पैथोलॉजी-रिपोर्ट टिकी हैं।
गोपा की ख़ून-जाँचें डॉक्टर के पास आ चुकी हैं और वे उन्हें समझ कर उसे बताते हैं कि उसे एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम नामक रोग है। इस रोग में शरीर
में जगह-जगह ख़ून के जमने से समस्याएँ पैदा होने लगती हैं और कई बार ख़ून बहने भी लगता है। यानी ख़ून के जमने और न जमने, दोनों में त्रुटियाँ, इस बीमारी में पायी जा सकती हैं।
गोपा और उसके पति जानना चाहते हैं कि ऐसा उसके साथ क्यों हुआ। किस कारण से उसे यह रोग है। किस लिए वह इतने सालों से माँ नहीं बन पा रही। क्या इस रोग की रोकथाम के लिए वे पहले से कुछ कर सकते थे।
डॉक्टर उन्हें बताते हैं कि इस रोग के होने में वे दोनों किसी भी रूप में ज़िम्मेदार नहीं हैं। एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम एक ऑटोइम्यून यानी स्वप्रतिरक्षक रोग है। इस बीमारी में गोपा के शरीर की सफ़ेद रक्त-कोशिकाएँ उसी के अंगों के खिलाफ हानिकारक प्रोटीन बना रही हैं। डॉक्टर बताते हैं कि ये प्रोटीन एंटीबॉडी कहलाती हैं। इन एंटीबॉडियों के कारण ही एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम नाम के इस रोग में खून के जमने में गड़बड़ियाँ पैदा होने लगती हैं। इन्हीं एंटीबॉडियों के लिये ही डॉक्टर ने महँगी जाँचें भेजी थीं, जो अब पॉज़िटिव आयी हैं। इन जाँचों में बढ़ी हुई ये एंटीबॉडी फ़ॉस्फ़ोलिपिड नामक पदार्थ के खिलाफ बनी हैं।
गोपा के पति जानना चाहते हैं कि फ़ॉस्फ़ोलिपिड क्या होते हैं। शरीर में उनका क्या काम है। क्या इनका होना ज़रूरी है? न ये होते और न इनके विरोध में शरीर एंटीबॉडी बनाता। फिर इन एंटीबॉडियों के बनने से उनकी पत्नी के माँ बनने की क्षमता कैसे प्रभावित हो रही है?
डॉक्टर उन्हें बताते हैं कि फ़ॉस्फ़ोलिपिड एक प्रकार की वसा है। एक बहुत ही ज़रूरी क़िस्म की वसा, जो हमारी कोशिका-कोशिका में है। इसके बिना हमारा अस्तित्व हो ही नहीं सकता। लेकिन गोपा का प्रतिरक्षा-तन्त्र गुमराह है। वह अपने फ़ॉस्फ़ोलिपिडों को पराया समझ रहा है। वह अपने ही पदार्थ पर हमला बोल रहा है। वह पहचान ही नहीं पा रहा कि इन फ़ॉस्फ़ोलिपिडों पर उसे आक्रमण नहीं करना है। नतीजन गोपा के शरीर में यह रोग प्रकट हो गया है।
डॉक्टर आगे यह भी कहते हैं कि जिस तरह से इस बीमारी में खून का जमना और बहना गड़बड़ हो जाता है, उसी तरह से स्त्री के गर्भाशय में गर्भ का विकास भी प्रभावित हो जाता है। नतीजन महिलाओं में इस रोग के कारण बार-बार गर्भपात होते हैं। अथवा कई बार मरे हुए शिशुओं का जन्म होता है। इस तरह से यह एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम सन्तानहीनता की एक वजह बन जाता है।
डॉक्टर का मानना है कि इस रोग से केवल र्यूमैटोलॉजिस्ट सीधे नहीं लड़ सकते। ज़्यादातर मरीज़ स्वयं इस रोग के बारे में जानते ही नहीं। ऐसे में गायनेकोलॉजिस्ट की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सन्तानहीनता की समस्याएँ उन्हीं के पास पहुँचती हैं। साथ ही शरीर के अलग-अलग हिस्सों में खून का जमाव लेकर रोगी अलग-अलग डॉक्टरों से परामर्श लेते हैं। इस तरह से डॉक्टर ही सजग-जागरूक होकर रोगियों के बारे में र्यूमैटोलॉजिस्टों से एक्सपर्ट राय ले सकते हैं और एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम को पकड़ा जा सकता है।
पिछले कई सालों से लगातार हो रहे गर्भपातों से जूझती गोपा के लक्षणों और ख़ून की जाँचों से उसमें एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम की पुष्टि हुई है। यह रोग प्रतिरक्षा-तन्त्र का है और इसमें अपनी ही फ़ॉस्फ़ोलिपिड नामक वसाओं के खिलाफ शरीर आक्रमण करने लगता है। ऐसा करने के लिए वह कई हानिकारक प्रोटीन बनाता है, जिन्हें एंटीबॉडी कहते हैं। इन्हीं एंटीबॉडियों के बढ़ते स्तर के कारण गोपा के गर्भाशय में गर्भ विकसित ही नहीं हो पाता और वह नष्ट हो जाता है। डॉक्टर गोपा से इस रोग के उपचार के बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन उपचार के पहले कोई अन्य रोग अगर साथ में हो, तो उसकी रोकथाम ज़रूरी है। बढ़ा ब्लडप्रेशर व कोलेस्टेरॉल या फिर कोई और बीमारी अगर है, तो उसे भी साथ में नियन्त्रित करना होगा।
डॉक्टर गोपा को बताते हैं कि ध्यानपूर्वक गायनेकोलॉजिस्ट और र्यूमैटोलॉजिस्ट के परामर्श मानने पर एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम के लगभग 70 % रोगियों में सफलतापूर्वक गर्भावस्था को पूरा करके शिशु को जन्म दिया जा सकता है। सबसे पहले ध्यान यह रखना है कि गर्भ प्लानिंग के अनुसार हो और फिर पूरे नौ महीने पीड़िता दोनों डॉक्टरों के लगातार सम्पर्क में रहे। सामान्य गर्भिणी महिलाओं की तुलना में गायनेकोलॉजिस्ट इन रोगियों में जच्चा-बच्चा, दोनों के स्वास्थ्य पर ज़्यादा नज़दीकी नज़र रखती हैं। ऐसा गर्भ में पल रहे शिशु और माँ, दोनों पर इस रोग के कोई दुष्प्रभाव को तुरन्त पकड़ लेने के कारण किया जाता है। एंटीफ़ॉस्फ़ोलिपिड सिंड्रोम के उपचार के लिए जिन दवाओं का प्रयोग डॉक्टर करते हैं, उनके मूल में ख़ून को जमने न देना है। लेकिन फिर ऐसा करने में जोखिम भी है। कारण कि इस उपचार के समय खून बहने भी लग सकता है। तो इसलिए इन दवाओं एस्पिरिन-हिपैरिन के प्रयोग के समय डॉक्टर बहुत सावधानी के साथ सम्पर्क में बने रहते हुए कुछ जाँचें कराते रहने के लिए कहते हैं। ऐसा करने से ख़ून जमने और खून बहने लगने की बीच की स्थिति में मरीज़ को रखते हुए, गर्भ के विकास को पूरा कर लिया जाता है।
डॉक्टर गोपा को बताते हैं कि गर्भ के पूरे होने के बाद भी ख़तरा टल गया हो, ऐसा नहीं होता। डिलीवरी के समय और उसके बाद भी रोग के बाबत कुछ बातों का ख्याल रखना पड़ता है और दवाओं को रोकना और बदलना पड़ता है। चूँकि इस तरह की जटिल प्रेग्नेन्सियों के बारे में सामन्य जन तो क्या, बहुत से डॉक्टरों को भी सीमित पता होता है, इसलिए ऐसी जच्चा-बच्चा देखभाल विशेषज्ञों के हाथ में ही देनी चाहिए। गोपा और उसके पति डॉक्टर को धन्यवाद देते हैं और ऊपर बतायी बातों पर अमल करते हुए आगे बढ़ने का निर्णय लेते हैं। उनके मन में सकारात्मकता है। आशा है शीघ्र ही चिकित्सा-विज्ञान की सहायता से उन्हें एक स्वस्थ सन्तान की प्राप्ति होगी।

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