गलत नहीं पीने पे पाबंदी

0
324
views

हाल ही में बीबीसी हिन्दी के साइद पर एक खबर देखा कि बिहार में शराबबंदी के बाद नीतिश कुमार ने अपराधों में 27 फ़ीसदी की कमी आने की जो बात कही थी, वह सही नहीं है। खबर के मुताबिक वो आपराधिक मामले, जिनमें पुलिस मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना जांच कर सकती है, अप्रैल-अक्टूबर, 2016 के बीच 13 फ़ीसदी बढ़ गए हैं। कहने का मतलब शराबबंदी से अपराध में कोई कमी नहीं आई है। हो सकता है रिसर्च सही हों, क्योंकि रिसर्च करने वालों ने आपराधिक रिकॉर्ड्स की फाइलें खंगाली होंगी। पर इस बात पर भी खास ध्यान देना चाहिए कि बिहार में जंगलराज के जनक भी तो सालों बाद सत्ता में शामिल हुए हैं। दूसरी बात ये कि सभी अपराधी नशे में ही अपराध नहीं करते, हां, लेकिन नशे की हालत में कोई न कोई अपराध जरूर होता है।
शराबबंदी का क्या असर हुआ है और इससे बिहार के लोगों को, खासकर महिलाओं को कितनी राहत मिली है, ये वहां के लोगों से मिलकर ही जाना जा सकता है। जहां हर गली-नुक्कड़ पर शाम होते ही शराबियों के झुंड महफिल सजा कर बैठ जाते थे, उन जगहों पर अब काम-धंधे की बातें होने लगी हैं। जिन घरों से रात में नशे में चूर मर्दों के चीखने-चिल्लाने की और औरतों के रोने-सिसकने की आवाजें आया करती थीं, उन घरों में अब माहौल बदल रहा है। हालांकि काफी दिनों तक शराबियों ने शराब न मिलने का फ्रस्ट्रेशन भी अपने घर-परिवार पर खूब निकाला। पर एक दिन तो सब सामान्य होना ही है।
समझना मुश्क‍िल है कि शराबबंदी को किसी भी वजह से गलत ठहराने वाले लोग किस मानसिकता के होंगे। राजनीतिक फायदे की बात अलग है। शराब की बिक्री से आने वाले राजस्व में भारी नुकसान की परवाह अगर राज्य सरकार और वहां की जनता को नहीं है तो ऐसे रिसर्चों का कोई भी औचित्य नहीं है। अगर रिसर्च करना ही है तो उन न दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों पर करना होगा क्योंकि कमी तो उन्हीं न दर्ज होने वाले मामलों में आ रही है और आएगी, अगर आगे भी कानून ऐसा ही सख्त रहा तो। हां, एक बात से लोगों को तकलीफ है कि कानून काफी सख्त बना दिया गया है। नए बिल के मुताबिक अगर कोई शराब पीता या रखता है, तो परिवार के सभी वयस्कों को गिरफ़्तार किया जा सकता है। कानून का उल्लंघन करने पर 10 साल जेल और 10 लाख जुर्माना हो सकता है। लेकिन ये भी सच है कि अगर कड़ी सजा का डर न हो तो किसी भी तरह की पाबंदी को लोग मानते कब हैं? हमारे देश की जनता तो इतनी चालाक है कि शराबबंदी हो या नोटबंदी, हर कानून का कोई न कोई तोड़ ढूंढ़ ही लेती है, कोई न कोई जुगाड़ लगा ही लेती है। शराबियों को इस कानून से आपत्त‍ि होना तो वाजिब है। ये भी सच है कि मधु, मधुशाला और सूरज अस्त-लोग मस्त वाली बातों में बहुत मजा है लेकिन इस मजे का शिकार होने वालों और उनका परिणाम भुगतने वालों को पूछिए कि शराबबंदी के फायदे क्‍या हैं। सरकार को पूरा हक है कि बिना कोई सफाई दिए इस कानून को ऐसे ही लागू रखे। अगर सरकार और कानून को हक न होता तो आत्महत्या करना अपराध की श्रेणी में क्यों आता? आखिर शराब खुद उसे पीने वाले के लिए भी तो जानलेवा ही है। माना कि किसी को नैतिकता सिखाने का अधिकार हमें नहीं पर सच तो यही है कि शराब व्यक्ति, परिवार, समाज और देश की सेहत के लिए बराबर रूप से घातक है और बस घातक ही है। मेरे हिसाब से तो पूरे देश में शराबबंदी लागू हो जानी चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here